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30-01-2014

The Era of Abundance - बहुतला का युग

मई का महीना। जला देने वाली गर्मी का तांडवदोपहर में लू इतनी तेज चल रही थी कि गाँव के सभी लोग अपने-अपने घरों में दुबके थे। गाँव के प्रधान रमेसर काका पेटगढ़ी से परेशान थेरह-रहकर उनका पेट बहुत ही तेज दर्द करने लगता था और वे छटपटाने लगते थे। लगभग एक हप्ते से वे दवा ले रहे थे पर कुछ खास आराम नहीं मिल पा रहा था। वे कमरे में लेटे-लेटे टीवी पर समाचार सुन रहे थे। बिजली नहीं थी और इंवर्टर भी डिस्चार्ज हो गया था इसलिए उन्होंने अपने छोटे बेटे पप्पू को बोलकर जनरेटर चालू करवाया था।
रमेसर काका की उम्र कोई 60-62 साल थी और वे दो बच्चों के पिता थे। उनका बड़ा बेटा गप्पू इंजीनियर था और दिल्ली में एक कंपनी में कार्यरत था। वह अपने परिवार के साथ दिल्ली में ही रहता था। दिल्ली में उसका खुद का एक आलीशान बंगला था। रमेसर काका के छोटे बेटे पप्पू की गाँव के पास के एक छोटे से शहर में दवाई की दुकान थी। वह दुकान भी चलाता था और आवश्यकतानुसार घर की देख-भाल भी करता था। उसने दुकान के काम में मदद के लिए एक और व्यक्ति को रखा था।
रमेसर काका अभी टीवी देखने में ही मशगूल थे कि उनका मोबाइल बज उठा। उनके बड़े लड़के का फोन था। उसने हाल-चाल लेने के लिए फोन किया था। उसने रमेसर काका से कहा कि आप दिल्ली आ जाइए, यहाँ किसी अच्छे अस्पताल में आपको दिखा दूँगा। अभी फोन पर रमेसर काका और गप्पू की बात चल ही रही थी कि पप्पू वहाँ आ गया और रमेसर काका से मोबाइल लेकर खुद ही अपने बड़े भाई से बात करने लगा। पप्पू ने गप्पू से कहा कि भइया आप यहाँ की चिंता न करें। मैंने बाबूजी के शयन-कक्ष में एसी भी लगवा दिया है। और हाँ एक अच्छे डॉक्टर से दिखाकर कुछ दवाइयाँ भी ले आया हूँ। अपने दोनों बेटों को बात करते देख रमेसर काका अतीत में खो गए। उन्हें अपने युवावस्था की याद आने लगी। उन्हें याद आया कि एक बार उनकी बहन बीमार पड़ गई थी और उनके पिताजी कोलकता में मजदूरी करते थे। वे लाख चाहकर भी समय पर अपने पिताजी को खबर न दे पाए और हाथ में पैसा न होने और अच्छे इलाज के अभाव में उनकी बहन भगवान को प्यारी हो गई। आज का युग कितना बदल गया है। अरे कल की ही तो बात है। मंगरू अत्यावश्यक कार्य के लिए 20000 रुपए माँगने आया था पर रविवार होने से बैंक भी बंद थे और मेरे पास भी इतने रुपए नहीं थे तो तुरंत पप्पू मोटरसाइकिल उठाया और एटीएम से रुपए लाकर मंगरू को दिया। पहले खेतों में बहुत मेहनत करने पर भी बहुत कम पैदावार होती थी पर आज वही जमीन सोना उगल रही है। उन्नत बीज हैं व विभिन्न प्रकार के उर्वरक के साथ ही कृषि के सभी साधन उपलब्ध हैं। ग्राम सेवक ने भी मिट्टी की जाँच करके खेती करने की वैज्ञानिक विधि बता दी है। सारी-सुख-सुविधाएँ भी गाँवों में उपलब्ध हैं। आज साइकिल की कौन बात करे, लोगों के पास मोटरसाइकिल, कार आदि है।
अभी रमेसर काका यही सब सोच रहे थे तभी पप्पू ने आवाज दी, बाबूजी, भइया आपको दिल्ली बुला रहे हैं। रमेसर काका बोल पड़ें, अरे मैं यहीं ठीक हो जाऊँगा। उतना दूर जाने की क्या जरूरत है। मैं घर छोड़कर इतना दूर कभी नहीं गया। रमेसर काका की बात सुनकर पप्पू हँसा और बोला, बाबूजी, आप चिंता न करें। मैंने अभी-अभी अपने लैपटॉप से आपके लिए और अपने लिए हवाई जहाज की टिकट बुक कर दी है। कल दोपहर में लखनऊ से दिल्ली के लिए हमारी उड़ान है। एक से दो घंटे में हम भइया के पास होंगे। और फिर 2-3 दिन में ही वापस भी आ जाएँगे।
रमेसर काका फिर से हैरान-परेशान। उन्हें वे दिन याद आ गए जब न अच्छी सड़कें थीं और न परिवहन के अच्छे साधन ही। उन्हें अपनी रिश्तेदारी में भी पैदल या साइकिल से जाना पड़ता था।
दूसरे दिन रमेसर काका पप्पू के साथ दिल्ली पहुँच गए। उसी दिन गप्पू ने उन्हें एक बड़े अस्पताल में दिखाया। रमेसर काका को एक बड़ी मशीन के भीतर से गुजरना पड़ा और बाद में डॉक्टर ने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं। आप बिलकुल ठीक हैं पर पेट में पथरी बन गई है। रमेसर काका और कुछ समझ पाते, इससे पहले ही उनकी रक्त-जाँच आदि की गई और उसी दिन उनके पेट की शल्यक्रिया करके पथरी भी निकाल दी गई। शल्यक्रिया के दूसरे ही दिन रमेसर काका अपने बड़े लड़के के घर पर आ गए थे।
रमेसर काका अपने बड़े बेटे के घर में लेटे थे और उनका पोता पास में ही वीडियो गेम खेल रहा था तभी दरवाजे की घंटी बज उठी। रमेसर काका का पोता बोल उठा, पापा आ गए। रमेसर काका कुछ समझ पाते तभी उनके पोते ने कमरे में लगी एक टीवी की तरफ इशारा किया। अरे यह क्या दरवाजे पर खड़ा उनका बेटा उस टीवी में साफ नजर आ रहा था। उनके पोते ने वहीं बैठे-बैठे एक बटन दबाया और मेन दरवाजा खुल गया। गप्पू अंदर आ गया।
रमेसर काका के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। वे सोच रहे थे कि आधुनिक युग आविष्कारों का युग है। विज्ञान ने बहुत ही तरक्की कर ली है। सुख-सुविधा के बहुत सारे साधन मौजूद हैं। पर एक बात रमेसर काका को कचोट कर रख दी। उन्होंने सोचा कि जब से आया हूँ न बहू से ठीक से बात हुई न बड़े बेटे से ही। दोनों अपने नौकरी-धंधे में लगे हैं। सुख-दुख बाँटने के लिए भी उनके पास समय नहीं है। बहुत मुश्किल से कभी-कभी नाश्ते और डिनर पर ही पूरा परिवार एक साथ हो पाता है। कभी रात को बहू घर नहीं आती तो कभी बेटा। उन्होंने सोचा कि पहले का युग बहुत पिछड़ा था, लोगों के पास सुख-सुविधाएँ न थीं पर मानसिक संतोष था। आज सब कुछ है पर मानसिक संतोष नहीं, मानसिक सुख नहीं। अगर व्यक्ति इन सारी सुख-सुविधाओं का उपयोग करते हुए अपनी नैतिक जिम्मेदारी भी समझे तो पृथ्वी स्वर्ग बन जाए।

-प्रभाकर पांडेय

06-07-2010

कहीं विज्ञान मूर्ख तो नहीं बना रहा।

मैं भी एक विज्ञान का छात्र रहा हूँ। वही विज्ञान जिसके बारे में कहा जाता है कि विशिष्ट रूप से संचित, सुव्यवस्थित एवं क्रमवद्ध ज्ञान को विज्ञान कहते हैं।
जैसे वैज्ञानिकों की दृष्टि में धर्म आदि में कही गई बातें अतथ्यपरक एवं औचित्यहीन हैं वैसे ही मुझे लगता है कि विज्ञान अपने आप में एक ढकोसला है। हाँ अगर विज्ञान को एक विशुद्ध ज्ञान के रूप में देखा जाए तो सर्वप्रथम धार्मिक पुस्तकों यानि वेद आदि को विज्ञान की श्रेणी में रखना उचित है।
बराबर ये सुना करता हूँ कि आज विज्ञान बहुत आगे है। नई-नई खोजें करके मानव जीवन में क्रांति ला रहा है। हर एक क्षेत्र में विज्ञान ने बहुत उन्नति कर ली है। अरे मुझे तो आधुनिक विज्ञान की उन्नति दिखाई नहीं देती। ये तो धर्म-ग्रंथों के आधार पर ही उसी में से कुछ विचार, चीज आदि लेकर परोस देता है और कहता है कि यह नया आविष्कार, नई खोज है।
हँसी आती है मुझे इस आधुनिक विज्ञान पर। मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि आधुनिक विज्ञान हमारे धर्म-ग्रंथों में से ही कुछ चुराकर उसे नए रूप में प्रस्तुत कर वाहवाही लुटता है। आप खुद ही आधुनिक युग के विज्ञान की सतयुग, त्रेता आदि के विज्ञान से तुलना करेंगे तो पाएँगे कि आधुनिक विज्ञान तो रत्तीमात्र भी नहीं है इन युगों के विज्ञान के आगे। यहाँ विज्ञान की परिभाषा आधुनिक युग के विज्ञान की नहीं है अपितु मैं विशुद्ध ज्ञान की बात कर रहा हूँ।
विज्ञान कहता है कि जल का निर्माण हाइड्रोजन और आक्सीजन के मिलने से हुआ है तो फिर जल को लेकर इतनी चिंता क्यों? विज्ञान क्यों नहीं हाइड्रोजन एवं आक्सीजन को मिलाकर जल बना लेता है। अति तो तब हो जाती है कि जब विज्ञान कहता है कि जलीय जंतु जल में मिली आक्सीजन को ग्रहण करते हैं। भाई विज्ञानजी, अगर ऐसा है तो एक छोटे से तालाब में जिसमें बहुत सारी मछलियाँ रहती हैं उसके जल का विघटन क्यों नहीं हो जाता। मछलियों द्वारा बार-बार आक्सीजन लेने से उस तालाब में आक्सीजन की कमी हो जानी चाहिए और हाँ जल की भी। भाई विज्ञान वही मछली जल से बाहर आते ही कुछ क्षणों में अपना प्राण क्यों त्याग देती है, क्या उसको जल के बाहर आक्सीजन नहीं मिलती। सच तो यह है कि मछली को जीवित रहने के लिए जल की ही आवश्यकता है नहीं की आक्सीजन की अस्तु उसे आप मानव की तरह आक्सीजन देकर जिंदा नहीं रख सकते। धार्मिक ग्रंथों में जो लिखा है कि जल एक तत्त्व है मैं बस उसी को सही मानता हूँ।
विज्ञान बाबा, क्या आपको पता है कि पौराणिक काल में भी आपरेशन होते थे। कायाकल्प होते थे। सर्जरी द्वारा भगवान गणेश के सिर पर हाथी का सिर जोड़ दिया गया था। तो क्या वह विज्ञान नहीं था या उस समय के लोग वैज्ञानिक नहीं थे। पुष्पक विमान के बारे में आपने तो सुना होगा ही विज्ञान बाबा जिसकी तुलना आपके आधुनिक जहाज से करना मुर्खता होगी। विज्ञान विज्ञान की रट लगाना गलत नहीं है पर धार्मिक बातों को झुठलाना गलत है। वास्तव में विज्ञान की बातें ही धर्मग्रंथो में दी गई है। विज्ञान जीवन को सुखमय, शांतिमय बनाने के लिए होता है जो ये धर्मग्रंथ करते आ रहे हैं। विज्ञान का अनुकरण कर कोई चोर हो सकता है, असभ्य हो सकता है पर इन धर्मग्रंथों का अनुकरण करके कदापि नहीं।
अरे भाई विज्ञान, पहले आप भी बोलते थे कि ग्रह नौ हैं और हमारा धर्म-शास्त्र तो युगों-युगों से बोलता आ रहा है कि ग्रह नौ हैं। हाँ पता नहीं कहाँ से आपने मन में आ गया कि अब ग्रह नौ नहीं आठ ही हैं तो वैज्ञानिक जनता भी बोलने लगी की ग्रह आठ हैं। पता नहीं क्यों लोग बोलते हैं कि धर्म-ग्रंथों में जो कहानियाँ दी गई हैं, जो लेख दिए गए हैं उनकी प्रमाणिकता पर संदेह है क्योंकि इनके बारे में प्रमाणिक जानकारी नहीं मिलती। तो भाई वैज्ञानिक जनता, मैं कहता हूँ कि ये आधुनिक विज्ञान जो नई-नई कथित आविष्कार, खोजें आदि कर रहा है क्या उसका प्रमाण आप के पास है। यहाँ पर भी तो आप उस कथित वैज्ञानिक की बातें ही मान रहे हैं। अगर वैज्ञानिक बोलता है कि पृथ्वी चपटी नहीं गोल है तो आप मान लेते हो। हो सकता है कि उस विज्ञान द्वारा लिया गया पृथ्वी का चित्र न होकर किसी और चीज का हो पर आप आँख बंद करके विश्वास कर लेते हो। आधुनिक विज्ञान ने बोल दिया की सूर्य स्थिर है तो आपने मान लिया। अच्छी बात है पर आप किस आधार पर कह सकते हैं कि सूर्य स्थिर है यह सदा सत्य है। अगर ग्रह नौ से आठ हो सकते हैं तो कल यही विज्ञान यह भी बोल सकता है कि सूर्य स्थिर नहीं घूमता है। जब विज्ञान अपनी ही बातों पर सहमति नहीं दे सकता तो हम इस पर विश्वास क्यों कर लें। धर्म-शास्त्रों में दी गई बातें तर्क पर आधारित हैं इसमें कोई दो-राय नहीं। हाँ इसके लिए आपको गहराई से चिंतन करने की आवश्यकता है बस। विज्ञान का मतलब विशुद्ध ज्ञान से है और वह ज्ञान इन कथित विज्ञान की पुस्तकों में नहीं अपितु गहरी खोज के बाद, चिंतन-मनन के बाद, परिशुद्ध सत्य पर आधारित हमारे धर्मग्रंथों में हैं। हाँ मैं यह मानता हूँ कि कुछ धर्म-ग्रंथों में भी कुछ ऐसी बातें हैं जो अतिश्योक्ति हैं पर इनमें इन ग्रंथों, अपने पूर्वजों का दोष नहीं, दोष आधुनिक मानव का ही है जो अपनी विद्वता का परिचय देते हुए इसमें भी सुधार कर दिए हैं और करना चाहते हैं।
मैं सदा बोलता रहुँगा कि सूर्य पूरब में उगता एवं पश्चिम में डूबता है। हाँ भाई जो उगेगा वह तो डूबेगा ही तो आप विज्ञान भाई शब्दकोशों में से उगना और डूबना जैसे शब्द भी निकाल दीजिए और बोलिए की सूर्य ना ही उगता है ना ही डूबता है वह तो स्थिर है।
विज्ञानजी मैं आपको गलत साबित नहीं कर रहा। मेरा तो बस यह कहना है कि जैसे एक शोधार्थी शोध में लगा होता है वैसे ही आप भी शोध में लगे रहिए और विशुद्ध ज्ञान, सत्य की खोज कीजिए जिसमें कोई परिवर्तन न हो, न कि धर्मग्रंथों आदि पर ही उंगली उठाकर इन्हें अतथ्यपरक आदि की संज्ञा से नवाजते रहिए और हाँ ये एक तो चोरी और ऊपर से सीनाजोरी वाली कहावत को चरितार्थ मत कीजिए अगर इन धर्म-ग्रंथों से ज्ञान प्राप्तकर आप कुछ नया लाते हैं तो इन धर्मग्रंथों को नमन करना मत भूलिए।।
अंत में मैं अपनी इस रचना के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ-

प्रभु ! तू बता अपनी
सच्चाई,
क्योंकि,तू अब नहीं बचेगा,
देख,मनुष्य ने ली है
अंगड़ाई.
क्या तू है ?
तेरा अस्तित्व है ?
देख,
विज्ञान आ गया है,
तेरा अस्तित्व,
हटा गया है.
तू खुद सोच,
मनुष्य लगाता है,
तेरे कार्यों में अड़चन,
वह तेरा करता है खंडन.
वह खुद ही लगा है,
बनाने,बिगाड़ने
सपनों को,अपनों को.
वह खुद ही बन बैठा है
भगवान ?
अगर तू है तो रुका क्यों है,
भाग जा,
जा ग्रहों पर छिप जा.
ना,ना,ना
वहाँ मत जाना,
देख,अब
आदमी के कदम,
थमेंगे नहीं,रुकेंगे नहीं,
वह तो ग्रहों पर
खाता है खाना.
अस्तु वहाँ छिपोगे तो,
पकड़े जाओगे,
कोई तेरी पूजा नहीं करेगा,
अपितु मारे जाओगे.
सोच खुद ही सोच,
मनुष्य कितना आगे निकल गया है.
वह कहता है कि
भगवान है झूठ,
कहीं उसका कोई
अस्तित्व नहीं,
विज्ञान ही है भगवान
सब कहीं.
तो फिर मैं तूझे
क्यों पूजूं ?
विज्ञान को ही पूजूंगा,
अभी नहीं,
उस दिन,
जिस दिन विज्ञान,
मौत को मार भगाएगा,
सब होंगे अमर,
किसी को तेरा नहीं होगा डर,
उस दिन,अहा उस दिन,
कितना खुश होऊँगा मैं,
खुशी,आनंद से,
झूम जाऊँगा मैं.
तब चिल्लाऊँगा,जोर जोर से,
मेरा प्रभु तो विज्ञान है,
और वैज्ञानिक हैं उसकी आकृति,
तब भाड़ में जाए तुम
और तेरी प्रकृति.
उस दिन हाँ उस दिन,
मैं तेरी पूजा करना,
बंद करूँगा,
देख हँस मत,
सिर्फ उसी दिन तक,
तुझे पूजता रहूँगा.

मान्यवरों, आज हमें विज्ञान पढ़ने की आवश्यकता नहीं अपितु वेद आदि पढ़ने की आवश्यकता है। जय हिंद। जय भारत।।

प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

15-06-2010

वाह..भाई...वाह...समझ समझ के समझ को समझो......

यहाँ कुछ रचनाएँ प्रस्तुत हैं...ये रचनाएँ मेरी नहीं है कहीं से सुनी गई हैं। रचनाकारों का नाम मुझे याद नहीं पर पठन योग्य हैं।। सादर।।


1. समझ समझ के समझ को समझो,
समझ समझना भी एक समझ है।
समझ समझ के जो न समझे,
मेरे समझ में वो ना समझ है।


2. हरि को खोजन हरि गए, हरि गए हरि के पास,
जब हरि हरि में मिले तो हरि हुए उदास।


3. जो पहुँची तूने भेजी है, वह पहुँची अब पहुँची है,
लेकिन फिर भी क्या पहुँची है, पहुँची तक न पहुँची है।


और अंत में सूरदास की यह रचना......


कहत कत परदेसी की बात,
मंदिर अरध अवधि बदि हमसों,
हरि अहार चलि जात।
सुर रिपु बरस,चंद्र रिपु युगवर,
हरि रिपु कीन्हों घात।
मघ पंचक ले गयो साँवरो,
ताते जी अकुलात,
नछत-बेद-ग्रह जोड़ि अर्ध करि,
सोई बनत अब खात।


हरि आहार का मतलब शेर का आहार यानि मांस तो यहाँ मांस से नहीं मास से मतलब है। कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण हम गोपियों से मंदिर अरध (मंदिर का मतलब घर और उसका अरध मतलब पाख या पक्ष यानि 15 दिन) का समय लेकर गए पर महीना बीत रहा है। सुर रिपु मतलब रात और चंद्र रिपु मतलब दिन और हरिरिपु मतलब कामदेव।
और हाँ मघ पंचक ले गयो साँवरो मतलब मघा नक्षत्र से पाँचवा नक्षत्र यानि चित्रा तो यहाँ चित्रा का मतलब चित्त से है यानि हमलोगों का चित्त लेकर चले गए हैं। नछत-बेद-ग्रह जोड़ि अर्ध करि (नक्षत्र 27, बेद 4, ग्रह 9, जोड़ने पर 40 और उसका आधा बीस यानी विष खाने की इच्छा हो रही है।)


ऊपर वाली रचनाओं का अर्थ आप बताएँ नहीं तो कुछ समय का इंतजार करें फिर मैं बताऊँगा।


सादर।।

11-06-2010

हिंदी ब्लागिंग ये तेरा कैसा रूप....

हिंदी के सभी ब्लागरों को सादर नमन।।

बहुत दिनों के बाद आज हिंदी ब्लागिंग में झाँकने का मौका मिला शायद वह भी नहीं मिलता अगर मेरे एक मित्र ब्लागर हमें फोन पर नहीं बताते की महाराज आप अब तक सोंए हैं..सोएँ हैं तो जाग जाइए.....अरे जरा हिंदी ब्लागिंग की ओर अपनी दृष्टि तो घुमाइए...आजकल यहाँ बहुत मजेदार ड्रामा चल रहा है...रोनेवाला रो और हँसनेवाला हँस रहा है.....मैं सोचा कि जरा देख लूँ कि क्या हो रहा है और उनके द्वारा भेजे हुए दो-3 ब्लाग यूआरएल पढ़ गया और पढ़ने के बाद मुझे तो यही लगा कि जो भी हो रहा है वह अच्छा तो बिलकुल नहीं हो रहा है। ये तो हिंदी ब्लागिंग को रसातल की ओर ले जाया जा रहा है। क्या ब्लागिंग का मतलब गुटबाजी और टाँगखिचाई है। अरे समाज, देश, विदेश में इतना सारा कुछ हो रहा है...अच्छाई से लेकर बुराई तक..अगर जिसपर कलम चलाई जाए तो सदा चलती रहेगी। इन सब मुद्दों को छोड़कर बस एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए ब्लागिंग की शुरुवात हुई थी क्या। अगर ब्लागिंग की शुरुवात करनेवाला यह देख ले तो वह पागल ही हो जाएगा, क्या इसी के लिए उसने ब्लागिंग की शुरुवात की थी कि ब्लागर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालें।
और तो और मुझे हँसी आ रही है इन जयचंदों पर जो मजा लेने और अपनी रोटी सेंकने के लिए कमेंट दे-देकर (कुछ लोगों के कमेंट सार्थक और साकारात्मक भी होते हैं...)  इस आग को और भड़का रहे हैं। भाई अपना हित तो सोंचो पर ऐसा हित सोंचो जो सदा बना रहे...आज उनकी तो कल उनकी जुबाँ को सही ठहरानेवालों क्या सही है उसी को सही ठहराओ...और हिंदी ब्लागिंग को डूबने से बचाओ। वैसे मुझे पता है कि आज की कथित ब्लागिंग डूबेगी नहीं...मेरा तो बस यह कहना है कि साकारात्मक सोचें और साकारात्मक लिखें।
ऐसी ब्लागिंग हो जो मनोरंजन के साथ ही साथ कुछ अच्छा दे जाए समाज को..कुछ मिले समाज को न कि एकदूसरे की टाँगखिंचाई हो और जगहँसाई हो।।

वरिष्ठ ब्लागरगण...सादर प्रणाम...अगर छोटों से कोई गलती हो तो उसे सुधारे न कि खुद छोटा बन जाएँ फिर आप काहे के वरिष्ठ....आप तो छोटे-से-छोटे की कटेगरी में आ जाएँगे।।
भाई लोगीं....विचार करें और हिंदी ब्लागिंग को एक सार्थक और साकारात्मक दिशा दें।। जय हिंदी ब्लागिंग, जय हिंद।।
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बरिष्ट ब्लागर सोनी जी का यह लेख पढ़े। और मेरे द्वारा इसपर की गई टिप्पणी।।
सोनीजी, सादर नमस्कार। आपका लेख पढ़ा, बहुत ही हँसी आई...क्या लिखते हैं आप। पर कभी आप एकांत में बैठकर चिंतन-मनन करें इस लेख...पर तो आपकी आत्मा शायद ही आपका साथ देगी। ऐसे पोस्ट हिंदी ब्लागिंग के लिए अभिशाप हैं। आप जैसे वरिष्ट लोग जिनको सबको साथ लेकर चलना चाहिए अगर वे ही ऐसा करें तो हिंदी ब्लागिंग का रसालत में जाना तय है। और अब मुझे हिंदी ब्लागिंग का असली चेहरा दिख रहा है। यहाँ साकारात्मक लेखन कम टाँग खिंचाई और गुटबाजी ज्यादे है। और ये भी पता है मेरे जैसे लोग जो किसी खेमे में जाना पसंद नहीं करते और इन खेमों को कलंक समझते हैं बस वे मन मसोसकर ही रह जाते हैं।
मुझे याद आ रहा है कि जब गाँव में एक कुत्ता भों भों करता था तो अन्य और भी बहुत से कुत्ते भों- भों करना शुरु कर देते थे।
आप की इस पोस्ट पर सभी ब्लागरों को चिंतन करना चाहिए खुद आपको भी..ताकि हिंदी ब्लागिंग गुटबाजी, टाँगखिचाईं से निकलकर साकारात्मकता की ओर आगे बढ़े।।
सादर धन्यवाद। अगर आपको मेरी इस टिप्पणी से ठेस पहुँची हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ पर मुझे बुरा-भला जो भी कहें पर मैं उनमें से नहीं जो गलत को भी सही कहकर अपनी रोटी सेंकते हैं...और मजे लुटते हैं, इनको क्या पता कि ये मजे एकदिन इनके लिए जंजाल बन जाएँगे.....
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हिंदी ब्लागिंग का कल्याण करनेवाले और उसका असली चेहरा दिखानेवाले कुछ और पोस्ट तो महान ब्लागरों द्वारा लिखे गए हैं-
1. आप तो ऐसे नहीं थे महराज.....
2. खैर आप भी तो कम नहीं...पर शायद गल्ती आप की नहीं...अगर जब बुजुर्ग ही ना समझें... बुजुर्ग = विद्वान।।


भाईजी...सादर प्रणाम...मुझे गाली देने से अच्छा है कि आप चिंतन-मनन करें और हिंदी ब्लागिंग को एक साकारात्मक दिशा दें।।। सादर धन्यवाद।।

- प्रभाकर पाण्डेय

09-06-2010

भोजपुरिया लाल : भारत रत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद

सदियों से भोजपुरिया माटी की एक अलग पहचान रही है। इस माटी ने केवल भोजपुरी समाज को ही नहीं अपितु माँ भारती को ऐसे-ऐसे लाल दिए जिन्होंने भारतीय समाज को हर एक क्षेत्र में एक नई दिशा दी एवं विश्व स्तर पर माँ भारती के परचम को लहराया। भोजपुरिया माटी की सोंधी सुगंध से सराबोर ये महापुरुष केवल भारत का ही नहीं अपितु विश्व का मार्गदर्शन किए और एक सभ्य एवं शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। यह वोही भोजपुरिया माटी है जिसको संत कबीर ने अपने विलक्षणपन से तो शांति, सादगी एवं राष्ट्र के प्रेमी बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी विद्वता एवं कर्मठता से सींचा।

माँ भारती के अमर सपूत, बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई नामक गाँव में अवतरित होकर भोजपुरिया माटी को धन्य कर दिया। भोजपुरिया माटी जो भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, संत कबीर आदि के कर्मों की साक्षी रही है, एक और महापुरुष को अपने आँचल में पाकर सुवासित और गौरवांवित हो गई। अपने लाल का तेजस्वी मुख-मंडल देखकर धर्मपरायण माँ श्रीमती कमलेश्वरी देवी फूले न समाईं और पिता श्री महादेव सहाय जो संस्कृत एवं फारसी के मूर्धन्य विद्वान थे अपनी विद्वता पर नहीं पर अपने लाल को देखकर गौरवांवित हुए।

प्रखर बुद्धि तेजस्वी बालक राजेन्द्र बाल्यावस्था में ही फारसी में शिक्षा ग्रहण करने लगा और उसके पश्चात प्राथमिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल में नामांकित हो गया। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे टी के घोष अकादमी पटना में दाखिल हो गए। 18 वर्ष की आयु में युवा राजेन्द्र ने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया एवं 1902 में कोलकाता के ही नामचीन प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ाई शुरु की। इसी प्रेसीडेंसी कालेज में परीक्षा के बाद बाबू राजेंद्र की उत्तर-पुस्तिका की जाँच करते समय परीक्षक ने उनकी उत्तर-पुस्तिका पर ही लिखा कि ''The examinee is better than the examiner.'' (परीक्षार्थी, परीक्षक से बेहतर है।) बाबू राजेंद्र की विद्वता की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है। बाबू राजेन्द्र की प्रतिभा दिन पर दिन निखरती जा रही थी और 1915 में उन्होंने विधि परास्नातक की परीक्षा स्वर्ण-पदक के साथ हासिल की। इसके बाद कानून के क्षेत्र में ही उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि भी हासिल की।

पारंपरिकतावाद के चलते 12 वर्ष की कच्ची उम्र में ही यह ओजस्वी किशोर राजवंशी नामक कन्या के साथ परिणय-बंधन में बँध गया और तेरह वर्ष की दहलीज पर पहुँचते ही गौना भी हो गया मतलब किशोर राजेन्द्र अपनी पत्नी के साथ रहने लगा। ऐसा माना जाता है कि 65-66 वर्ष के वैवाहिक जीवन में मुश्किल से लगभग 4 साल तक ही यह महापुरुष अपनी अर्धांगनी के साथ रहा और बाकी का जीवन अपनी माँ भारत माता के चरणों में, मानव सेवा में समर्पित कर दिया।

माँ भारतीय का यह सच्चा सेवक अपनी माँ को फिरंगियों के हाथों की कथपुतली होना भला क्यों देख सकता था। इस महान भोजपुरिया मनई ने माँ भारती के बेड़ियों को काटने के लिए, उसे आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने लगा और वकालत करते समय ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को झोंक दिया। यह महान व्यक्ति महात्मा गाँधी के विचारों, देश-प्रेम से इतना प्रभावित हुआ कि 1921 में कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर के पद को लात मार दिया और विदेशी और स्वदेशी के मुद्दे पर अपने प्रखर बुद्धि पुत्र मृत्युंजय को कोलकाता विश्वविद्यालय से निकालकर बिहार विद्यापीठ में नामांकन कराकर एक सच्चे राष्ट्रप्रेमी की मिसाल कायम कर दी। इस अविस्मरणीय एवं अद्भुत परित्याग के लिए भारती-पुत्र सदा के लिए स्वदेशीयों के लिए अनुकरणीय एवं अर्चनीय बन गया। गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन को सफल बनाने के लिए इस देशभक्त ने भी बिहार में असहयोग आन्दोलन की अगुआई की और बाद में नमक सत्याग्रह आन्दोलन भी चलाया।

देश सेवा के साथ ही साथ राजेन्द्र बाबू मानव सेवा में भी अविराम लगे रहे और 1914 में बिहार एवं बंगाल में आई बाढ़ में उन्होने बढ़चढ़कर लोगों की सेवा की, उनके दुख-दर्द को बाँटा और एक सच्चे मनीषी की तरह लोगों के प्रणेता बने रहे। राजेंद्र बाबू का मानव-प्रेम, भोजपुरिया प्रेम का उदाहरण उस समय सामने आया जब 1934 में बिहार में आए भूकंप के समय वे कैद में थे पर जेल से छूटते ही जी-जान से भूकंप-पीड़ितों के लिए धन जुटाने में लग गए और उनकी मेहनत, सच्ची निष्ठा रंग लाई और वाइसराय द्वारा जुटाए हुए धन से भी अधिक इन्होनें जुटा दिया। अरे इतना ही नहीं माँ भारती का यह सच्चा लाल मानव सेवा का व्रत लिए आगे बढ़ता रहा और सिंधु एवं क्वेटा में आए भूकंप में भी भूकंप पीड़ितों की कर्मठता एवं लगन के साथ सेवा की एवं कई राहत-शिविरों का संचालन भी किया।

इस महान विभूति के कार्यों एवं समर्पण से प्रभावित होकर इन्हें कई सारे पदों पर भी सुशोभित किया गया। 1934 में इन्हे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुना गया। इन्होंने दो बार इस पद को सुशोभित किया। भारतीय संविधान के निर्माण में भी इस महापुरुष का बहुत बड़ा योगदान है। उनकी विद्वता के आगे नतमस्तक नेताओं ने उन्हें संविधान सभा के अध्यक्ष पद के लिए भी चयनित किया। बाबा अंबेडकर को भारतीय संविधान के शिल्पकार के रूप में प्रतिस्थापित करने में इस महान विभूति का ही हाथ था क्योंकि यह महापुरुष बाबा अंबेडर के कानूनी विद्वता से परिचित था। स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में इसने कार्यभार संभाला और अपनी दूरदृष्टि एवं विद्वता से भारत के विकास-रथ को विकास मार्ग पर अग्रसर करने में सहायता की। यह महापुरुष सदा स्वतंत्र रूप से अपने पांडित्य एवं विवेक से कार्य करता रहा और कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं होने दिया।

इस महान विभूति में देश-प्रेम, परहितता इतना कूट-कूटकर भरी थी कि भारतीय संविधान के लागू होने के एक दिन पहले अपनी बहन भगवती देवी के स्वर्गवास होने के बावजूद ये मनीषी पहले देश के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाया और उसके बाद अपनी बहन के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ।

इस महापुरुष के चाहनेवालों में केवल भोजपुरिया ही नहीं अपितु पूरे भारतीय थे। इनकी लोकप्रियता लोगों के सिर चढ़कर बोलती थी। इसका ज्वलंत उदाहरण यह है कि पंडित नेहरू डा. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहते थे पर बाबू राजेंद्र प्रसाद के समर्थन में पूरे भारतीय समाज को देखकर वे चुप्पी साध लिए थे। जब 1957 में पुनः राष्ट्रपति के चयन की बात उठी तो चाचा नेहरू ने दक्षिण भारत के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर अपनी यह मंशा जाहिर की कि इसबार कोई दक्षिण भारतीय को ही राष्ट्रपति बनाया जाए पर दक्षिण भारतीय मुख्यमंत्रियों ने यह कहते हुए इस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि जबतक डा. राजेन्द्र प्रसाद हैं तबतक उनका ही राष्ट्रपति बने रहना ठीक है और इस प्रकार राजेन्दर बाबू को दुबारा राष्ट्रपति मनोनीत किया गया। 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के पद को सुशोभित करने के बाद सन 1962 में उन्होंने अवकाश ले लिया। इस महापुरुष की सादगी, समर्पण, देश-प्रेम, मानव-प्रेम और प्रकांड विद्वता आज भी लोगों को अच्छे काम करने की प्रेरणा प्रदान करती है। इस महान भोजपुरिया को सर्वोच्च भारतीय नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।

इस महापुरुष ने 1946 में अपनी आत्मकथा लिखने के साथ ही साथ कई अन्य चर्चित एवं पठनीय पुस्तकों की रचना भी की जिसमें बापू के चरणों में, गाँधीजी की देन, भारतीय संस्कृति, सत्याग्रह एट चंपारण, महात्मा गाँधी और बिहार आदि विचारणीय हैं।

माँ भारती का यह अमर सेवक 28 फरवरी सन 1963 को राम, राम का जाप करते हुए अपने इहलौकिक नश्वर शरीर को त्यागकर सदा-सदा के लिए परम पिता परमेश्वर के घर का अनुगमन किया और अपने सेवा भाव में पले-बड़े भारतीय जनमानस को सदा अग्रसर होने के लिए प्रेरित कर गया।
आज कुछ भारतीय चिंतकों को बहुत ही अफसोस होता है कि इस महापुरुष के लिए आजतक भारत सरकार ने ना ही किसी दिवस की घोषणा की और ना ही इनके नाम से किसी बड़े कार्य की शिला ही रखी। अपने घर बिहार में भी अपनो के बीच माँ भारती के इस अमर पुत्र को उतना राजकीय सम्मान नहीं मिला जितना अन्य इनसे भी छोटे-छोटे राजनीतिज्ञों एवं नामचीन लोगों को।

खैर ऐसे महापुरषों को किसा सम्मान की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे महापुरुष तो लोगों के दिल में विराजते हैं, सम्मान पाते हैं और जनमानस द्वारा जयकारे जाते हैं। हर भारतीय, हर भोजपुरिया आज गौरव महसूस करता है कि वह इतने बड़े महापुरुष की सन्तान है। वह आज ऐसी मिट्टी में खेल-कूद रहा है, ऐसी हवा में साँसे ले रहा है जिसमें पहले ही राजेन्द्र प्रसाद जैसी विभूतियाँ खेल-कूद चुकी हैं, साँसे ले चुकी हैं।

धन्य है वह भारत नगरी जहाँ ऐसे-ऐसे महापुरुषों का प्रादुर्भाव हुआ जिनकी कीर्ति आज भी पूरे विश्व को रोशन कर रही है। ऐसे महापुरुषों के कर्म हम भारतीयों को गौरवांवित करते हैं और हम शान से सीना तानकर कहते हैं कि हम भारतीय है। माँ भारती के इस अमर-पुत्र, भोजपुरियों के सरताज, प्रकांड विद्वान, सहृदय, भारतीयों द्वारा पूजित इस महापुरुष को मैं शत-शत नमन करता हूँ।

-प्रभाकर पाण्डेय

14-02-2010

इन धमाकों पर आँसू मत बहाओ

आज क्या हो गया है हमें, हम रोना-धोना कब बंद करेंगे। कब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए प्रयासरत होगें। धमाका होते ही मिडिया, पुलिस और हम सभी सक्रिए हो जाते हैं। इन धमाकों पर नई-नई बहसों की शुरुवात कर देतें है। पुलिस सर्वप्रथम ये पता लगाने की कोशिश करती है कि इन धमाकों में किसका हाथ है और मिडिया तो चिल्ला-चिल्लाकर ये खबर देने का दावा करती है कि इन धमाकों में कितने मरे, कितने घायल हुए इन सबकी जानकारी सबसे पहले हमने दी।
आखिर कबतक और कबतक ये चलता रहेगा। कबतक सरकार इन मरे हुए लोगों के परिवारवालों को पैसे बाँटती रहेगी और मिडिया नए-नए खुलासे करने में लगी रहेगी। कबतक हम पुलिसवालों और सरकार को कोंसते रहेंगे और बहसबाजी करते रहेंगे।
अगर ये ऐसा ही चलता रहेगा तो वो दिन दूर नहीं जब इन मुद्दों पर बात करने के लिए न हमारे जैसे निकम्मे, बहसू लोग होंगे न रहस्योघाटन करने के लिए गलाफाड़ू मिडिया और न होगी निकम्मी सरकार। ये सभी इन धमाकों की बलि चढ़ गए होंगे।
आज हमें ये लगता है (जो बच जाते हैं।) चलो हमें तो कुछ नहीं हुआ। सरकार का काम है इन सब पर काबू पाना पर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि सरकार बनाना हमारा काम है और देश का एक नागरिक होने के नाते हमारा भी कर्तव्य बनता है कि अपनी जिम्मेदारी को समझें, देश के प्रति जिम्मेदारी को।
आज रोना न रो के लड़ने के लिए कमर कस लिया जाए, इन निकम्मे नेताओं को, सरकार को उखाड़ फेंका जाए जो ये समझते हैं कि वे सेफ हैं पर वे ये भूल जाते हैं कि आतंकवाद अगर ऐसे ही सुरसा की तरह मुँह फैलाए रहा तो हो सकता है कि वे बँच जाएँ पर उनकी संताने तो हरगिज नहीं बचेंगी, उनको भी इन धमाकों से दहलना होगा।
बंद करो भाषणबाजी और एक ऐसा एंटीआतंकवादी दल बनाओ जो माँ भारती की रक्षा के लिए अपने को कुर्बान करके इसकी लाज को बचाएँ, और भारतीयों को असामयिक मौत के मुँह में जाने से रोके। हम भी आतंकवाद के खिलाफ कुछ ऐसा करें ताकि उनकी रूहें भी काँप जाएँ और वे कभी सपने में भी भारत की ओर आँख उठाकर न देंखे जो आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।
मैं तैयार हूँ। भले सरकार मुझे फाँसी दे दे या आतंकवाद का शिकार हो जाऊँ। पर मुझे केवल देश के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले लोगों का साथ चाहिए जो माँ भारती की आबरू की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हों। अगर मेरे एक मरने से हमारी संतानें, हमारा देश सुरक्षित हैं तो मैं तैयार हूँ...तैयार हूँ...तैयार हूँ.....जय हिंद.........जय माँ भारती।।।।।।।।।
मेरा कंटेक्ट नंबर-09773954457

25-07-2009

भोजपुरी वर्णमाला (देवनागरी लिपि)

कृपया ध्यान दें- भोजपुरी वर्णमाला विशेषकर हिंदी के समान ही है।


स्वर एवं उसकी मात्रा अ, आ (ा), इ (ि), ई (ी), उ (ु), ऊ (ू), ए (े), ऐ (ै), ओ (ो), औ (ौ), अं (ं)


नोट :- 1. हिंदी के आधार पर देखें तो भोजपुरी में अधिकांश शब्दों में ै, ो इन स्वर चिन्हों के स्थान पर इन (ै के लिए एवं ो के लिए ) स्वरों का ही प्रयोग होता है अगर ये स्वर चिन्ह (ै, ो) उस शब्द के एकदम अंतवाले व्यंजन पर न लगे हों। जैसे- जइसे, पइसा, कइसा, जइसा, चउका, मउसा, मउसी (हिंदी- जैसे, पैसा, कैसा, जैसा, चौका मौसा, मौसी)


2. ृ (ऋ) के लिए रि का प्रयोग होता है। जैसे- कृपया, ऋतु (हिंदी- किरपया, रितु)


व्यंजन- क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, स, ह, त्र (तिर्)


3. भोजपुरी में विशेषकर क्ष के लिए छ, ष के लिए ख या स, त्र के लिए तिर, ज्ञ के लिए ग्य का प्रयोग होता है और हाँ ण के लिए न ही आता है। पर एक बात याद रखें संस्कृतनिष्ठ शब्दों कभी-कभी बिना बदलाव के लिखा जाता है और उसमें क्ष, त्र, ज्ञ आदि अपने मूल रूप में आ जाते हैं।

कुछ उदाहरण देखें-

1.ग्यानी, छमा, तिरसूल, पुरान (हिंदी- ज्ञानी, क्षमा, त्रिशूल, पुराण)

2. खटकोन, कोस (हिंदी- षटकोण, कोष या कोश)


नोट- भोजपुरी में क़, ख़, ज़, फ़ जैसे अरबी वर्णों का प्रयोग नहीं होता।


-प्रभाकर पाण्डेय


भोजपुरी में 'है-IS, हैं-ARE, हो-ARE' के लिए प्रयुक्त होनेवाले शब्द

भोजपुरी

हिंदी

अंग्रेजी

बा

राम कहाँ बा?

है

राम कहाँ है?

Is

Where is Ram?

बाने (आदरार्थी)

तोहार बाबूजी काहाँ बाने?

हैं

तुम्हारे पिताजी कहाँ हैं?

Is

Where is your father?

बानी (अति-आदरार्थी)

राउर बाबूजी काहाँ बानी?

हैं

आपके पिताजी कहाँ हैं?

Is

Where is your father?

बानेकुलि / बाड़Sकुलि (बहुवचनीय)

लइकवा काहाँ बानेकुलि?

हैं

लड़के कहाँ हैं?

Are

Where are children?

बा लोग

(बहुवचनीय- आदरार्थी) लइका लोग काहाँ बा लोग?

हैं

लड़के कहाँ हैं?

Are

Where are children?

बा सब

(बहुवचनीय- अति-आदरार्थी)

संतसब कहाँ बा सब?

हैं

संतलोग कहाँ हैं?

Are

Where are saints?

बाड़े, बाड़S (एकवचन)

ते काहाँ बाड़े?

तूँ काहाँ बाड़?

हो

तुम कहाँ हो?

आप कहाँ हो?

Are

Where are you?

बाड़Sकुलि, बाड़Sलोगन (आदरार्थी), बानीसभे/बानीसभें (अति-आदरार्थी) (ये सभी बहुवचन हैं)

तहकुलि काहाँ बाड़Sकुलि? / तहलोगन काहाँ बाड़Sलोगन?

हो

तुम लोग कहाँ हो?

आपलोग कहाँ हो?

Are

Where are you?

कृपया ध्यान दें-

1. अगर शब्द ही बहुवचनीय या आदरार्थी हो तो बा लोग, बा सब का प्रयोग नहीं भी कर सकते हैं। जैसे- लइका लोग काहाँ बा? लड़के कहाँ हैं? (Where are children?) / संत सब कहाँ बा? संतलोग कहाँ हैं? (Where are saints?) / तहलोगन कहाँ बाड़S? आपलोग कहाँ हो (हैं)? (Where are you?)

2. स्त्रीलिंग में बा के लिए बा चाहें बिया, बाने के लिए बाड़ी या बानी हो जाता है।

-प्रभाकर पाण्डेय

22-01-2009

गोटी चम किसकी यानि दसों उँगलियाँ घी मे किसकी

बाबूजी मुंबई से आए हैं और बहुत उदास हैं। कह रहे हैं कि छोटा-मोटा काम अपने गाँव-जवार में ही मिल जाएगा तो करूँगा पर अब मुंबई नहीं जाऊँगा। अब वहाँ के जीवन का कोई भरोसा नहीं है, कब क्या हो जाएगा कोई नहीं जानता। अब तो पूरे भारत में आतंकवाद ने अपना पैर पसार लिया है। इन सब दंगे-फसादों से जो बच गया वह भगवान को दुहाई दे रहा है और जो आतंकवाद के भेंट चढ़ गया उसके भी माई-बाप, भाई-बहन, मेहरारू और बेटे-बेटियाँ भगवान से पूछ रहे हैं कि यह आप क्या कर दिए???

बाबूजी को माई सांत्वना दे रही है, समझा रही है। वह बाबूजी से कह रही है कि इस जबाने में नेतालोगों, भ्रष्टाचार अधिकारियों को दो-चार लाख घूस देने पर भी सरकारी नौकरी मिल पाना मुश्किल है और आप हैं कि आतंकियों के डर से यह नौकरी छोड़ने की बात कह रहे हैं। माँ आगे कह रही है कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। अब अपनी सरकार आतंकवाद पर गंभीरता से विचार कर रही है और इसके समूल नाश के लिए बीड़ा भी उठा ली है। आप देखिएगा बहुत जल्द ही आतंकवाद का सफाया हो जाएगा। अब मुझे माई की सिसकी सुनाई दे रही है, वह कह रही है लड़कों की पढ़ाई-लिखाई है, दवा-दारू है, नेवता-पठारी है, दो-चार कट्ठा खेत के लिए खाद-बिया, जोताई-हेंगाई है और तो और हमलोग तो रूखा-सूखा भी खाकर रह लेंगे, कुछ भी नहीं मिलेगा तो उपास भी कर लेंगे पर घर में एक लड़कौरी पतोहू है, एक दूध-पीता पोता है, उन दोनों का क्या होगा?

माई और बाबूजी के बीच चल रही यह बातचीत मैं दोगहा में बैठकर सुन रहा हूँ। मैं बाबूजी की बात सुनकर उदास हो गया हूँ। मुझे यह चिंता सता रही है कि क्या बाबूजी अब सही में मुंबई नहीं जाएँगे? दो-चार दिन के बाद, एकदिन क्या देख रहा हूँ कि माई सतुआ-पिसान बाँध रही है, गोझिया और लिट्टी बना रही है। मेरी औरत भी माँ का हाथ बँटा रही है। मैं जान नहीं पा रहा हूँ कि यह तैयारी क्यों हो रही है? अभी मैं इसी उधेड़-बुन में हूँ तभी मेरी औरत मेरे पास आकर कहती है कि बाबूजी आज ही कुशीनगर (एक्सप्रेस)से मुंबई जा रहे हैं।

मलिकाइन (पत्नी) की यह बात सुनकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं दौड़ते हुए घर से बाहर निकला और सीधे अपने लँगोटिया यार चिखुरी के घर पहुँचा। मुझे देखते ही मेरे यार चिखुरी ने पूछा, "क्या यार नकछेदन! आज बहुत खुश दिख रहे हो? कोई बात है क्या?" मुझसे अपनी खुशी रोकी नहीं गई और मैं कह बैठा, "हाँ यार! मेरी गोटी तो चम है।" मेरा यार बोला, "बुझौवल क्यों बुझा रहे हो भाई, साफ-साफ बताओ कि क्या बात है?" "यार! मेरे बाबूजी मुंबई जाने के लिए तैयार हो गए हैं और तुम तो जानते ही हो कि भारत का हर शहर खासकर महानगर आतंकवाद की चपेट में हैं। सरकार केवल लउर-लबेदई हाँक रही है, आतंकवाद को उखाड़ फेंकने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर रही है, जनता को समझा रही है कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है सबकुछ सामान्य है पर मैं तो जान ही रहा हूँ कि ये सब ओट की राजनीति है। कुछ होनेवाला नहीं है, यह सब हवाई फायरिंग है। पाकिस्तान भी समझ रहा है कि यह सब गीदड़-भभकी है।", ये सारी बातें मैं एक ही साँस में बोल गया।
मेरे यार ने कहा, "यह तो तुम लाख रुपए की बात कह रहे हो, लोग भी धीरे-धीरे शांत हो जाएँगे, चिल्लानेवाले में बस वही बचा रह जाएगा जिसपर आतंक की मार पड़ी हो। हाँ पर तुम एक बात बताओ इससे तुम्हारी चम गोटी का क्या लेना-देना?" मैंने कहा, "तुम भी जीवनभर बुरबक ही रह गए। मान लो, इसी तरह से आतंकवाद फलता-फूलता रहेगा तो एक दिन मुंबई से मुंसीपार्टी का पत्र मेरे पास आएगा कि हमें बहुत दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि आपके बाबूजी आतंक की भेंट चढ़ गए। आप जल्दी से आकर उनकी जगह पर नौकरी ज्वाइन कर लीजिए और हाँ एक बात और घबराने की कोई बात नहीं है और सरकार भी मृतक लोगों के परिवार को पाँच-पाँच लाख दे रही है। अब यार तुम ही बताओ, मुझ जैसे बेरोजगार के लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या होगी?"
मेरी बात सुनकर मेरा यार तो चिहा गया पर कुछ सोचकर बोला, "यार नकछेदन! केवल तुम्हारी ही गोटी चम नहीं है, तुम्हारे लड़के की भी गोटी चम है और अगर आतंकवाद ऐसे ही पैर जमाए रहा तो सियार-गिद्ध सबकी गोटी चम है।" मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया और मैं पूछा कि अरे यार, तुम यह क्या बात कर रहे हो?
मेरे दोस्त चिखुरी ने कहा कि नाराज मत हो, जिस तरह से मुंसीपार्टी का पत्र तुम्हारे पास आएगा वैसे तुम्हारे लड़के के पास भी तो आएगा। और हाँ अगर आंतकवाद को रोका नहीं गया तो कोई पत्र लिखनेवाला भी नहीं बचेगा और सियार-गिद्ध मांस नोच-नोचकर निहाल हो जाएँगे। चिखुरी की यह बात सुनकर मेरी बोलती बंद हो गई और मैं दौड़ते हुए घर आया और बाबूजी को मुंबई जाने से रोक लिया।

(यह लेख तो काल्पनिक है। बस मैं यह कहना चाहता हूँ कि अगर समय रहते सरकार और भारत की जनता जगी नहीं तो बहुत देर हो जाएगी और सबकुछ तहस-नहस हो जाएगा। अगर जनता खुद ईमानदार नहीं बनेगी और स्वार्थ से ऊपर नहीं उठेगी तो सरकार और सफेदपोशों की तो वैसे ही गोटी चम है और चम है आतंकवाद की, भ्रष्टाचार की, अमरीका और पाकिस्तान की।
आज भारतीयों के लिए देश-प्रेम शब्द मात्र एक शब्द बन कर रह गया है। हम छोटी-छोटी समस्याओं में ही, अपने स्वार्थ में ही उलझ कर रह गए हैं। आज देश संबंधी समस्याओं की ओर किसी का ध्यान भी नहीं है। सबको बस अपने-अपने की पड़ी है। आज जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद के आगे राष्ट्रवाद नगण्य हो गया है। आज हम इतने गिर गए हैं कि अच्छे और बुरे का हमें ज्ञान ही नहीं रहा।)
जागो भारतवासियों जागो और निकम्मे नेताओं को छठी का दूध याद दिला दो ताकि देश और समाज हित में काम करनेवाला व्यक्ति ही नेता बने। नेता शब्द की गरिमा कायम रहे।
भारत माता की जय।

-प्रभाकर पाण्डेय

 
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