जालिमों तुम कितना भी जुल्म ढा लो पर मैं शीर्षक बदलनेवाला नहीं। अजीब हाल है भाई। मैं चिट्ठाकार हूँ, अपने चिट्ठे में कुछ भी लिखूँ, अनाप-शनाप लिखूँ, मानवता मरे या चिट्ठा, ये देखना मेरा काम नहीं जालिमों।
चिट्ठाकार जगत के लिक्खाड़ जालिमों एवं चिट्ठा-पाठकों, मैंने शीर्षक कुछ भी लिखा लेकिन तुम-सब भी तो मेरे इस मुहिम में झंडा लेकर मेरे साथ खड़े हो गए। अगर तुमे मेरा शीर्षक पसंद नहीं आया तो तुम वो चिट्ठा पढ़े ही क्यों? मेरे चिट्ठे की हीट्स बताती है कि तुम सब मेरे साथ हो। हम-सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। हम भले शीर्षक बदलने की बात कर रहे हैं पर अंदर से हमें मजा आ रहा है।
अब असली बात पर, महानुभावों आप लोगों को शीर्षक देखने के बाद वह पोस्ट पढ़ने की आवश्यकता ही क्या थी, अगर आप नहीं पढ़ते तो हिट्स भी 0.. होती और टिप्पणी भी जीरो।
जब सब 0 होता तो लेखक भी 0 होता और वह सीना तान के यह नहीं कह रहा होता की नहीं बदलूँगा, शीर्षक।
सोचिए जिम्मेदार कौन। इस चिट्ठे पर हमारे गणमान्य बुजुर्ग चिट्ठाकारों की एक भी टिप्पणी नहीं है जो इस बात की गवाह है कि उन लोगों ने इस शीर्षक को अहमियत ही नहीं दिया।
दोषी न शीर्षक है न जालिम दोस्तों, दोषी तो हम जालिम हैं।
-प्रभाकर पाण्डेय
२४-०६-२००८
शीर्षक नहीं बदलूँगा.....जालिमों
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6 टिप्पणी:
एक दम सोलह आने
सही बात कह दी आपने। पूरी तरह से सहमत हूँ।
बड़ी जालिम है ये दुनिया जो जालिम को न समझ सकी:)
बढिया है!!!
http://billoresblog.blogspot.com/
par is aalekh pe tipiya diyaa hai
bair anumati ke
pad leejie kaaryetar sveekriti prarthaneey hai
सोलह आने,बढिया...
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