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25-07-2008

कम डर बाघ का अधिक डर टिपटिपवा का : भोजपुरी लोककथा

एक गाँव के बाहर रामू नामक एक हरिजन ने अपने रहने के लिए एक झोपड़ी डाल रखी थी। वह अपने परिवार का गुजर-बसर करने के लिए प्रतिदिन जंगल में जाता और वहाँ से मरे हुए जानवरों का चमड़ा एकत्रित करके लाता। उन चमड़ों से वह जूता बनाता और बाजार में बेंच आता। यही उसकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी और पेट पालने का साधन।
एक दिन जब वह जंगल में चमड़ा एकत्रित कर रहा था तभी वहाँ एक बाघ आ पहुँचा। बाघ को अपनी ओर आता देख वह डर गया और लगा बाघ से बचने की उपाय सोचने। उसने भागना ठीक नहीं समझा क्योंकि अगर वह भागता तो बाघ दौड़ाकर पकड़ लेता। उसका दिमाग तेजी से काम करना शुरु किया और वह एक लकड़ी लेकर लगा जमीन नापने। बाघ जब उसके पास आ गया तो पूछा, "यह क्या कर रहे हो?" इसपर रामू ने कहा, "ऐ, मेरे माई-बाप! आपकी कृपा से ही हमारा जीवन यापन हो रहा है। माँस खाने के बाद जो आप चमड़ा छोड़ देते हैं उसी चमड़े का मैं जूता बनाकर कुछ पैसे कमा लेता हूँ। मैं तो आपके पैर का निशान नाप रहा था ताकि आप अन्नदाता के लिए भी जूते बना दूँ।" रामू की बात सुनकर बाघ बहुत ही प्रसन्न हो गया और लगा अपने पैर की नाप देने। दिखावटी नाप लेने के बाद रामू अपनी जान बचाकर घर भाग आया।

रामू ने घर आकर यह घटना अपनी बीबी को सुनाया। उसकी बीबी ने कहा कि चलिए, जान तो बच गई पर अगर बाघ आपको खोजते हुए यहाँ आ गया तो क्या होगा? इसपर रामू ने कहा कि जब बाघ यहाँ आएगा तो देखा जाएगा।

एक दिन की बात है कि सुबह से ही हल्की टीपा-टापी बारिश (बूँदा-बाँदी) हो रही थी। रात होने को आ गई। रामू खाट पर पड़ा, सोच रहा था कि अगर एसे ही दिन रहेगा तो रोजी-रोटी का जुगाड़ कैसे होगा? अभी वह यही सब सोच रहा था तभी बाघ उसके घर के पिछवाड़े आकर एक पेड़ में लगा अपना शरीर रगड़ने। रामू की बीबी ने कहा कि लगता है घर के पिछवाड़े बाघ आ गया है। इसपर रामू ने कहा , " चुप रहो! कम डर बाघ का अधिक डर टिपटिपवा का (चुप रहु! थोर डर बघवा के ढेर टिपटिपवा के)। " रामू की बात सुनकर बाघ सोचा कि यह टिपटिपवा कौन है जिससे यह इतना डर रहा है।
तभी क्या हुआ कि रामू के गाँव के ही एक धोबी का गदहा कहीं खो गया और वह उस गदहे को खोजते हुए रामू के घर के पास आ गया और दरवाजे पर से ही रामू को हाँक लगाया, "ए भाई! मेरे गदहा को कहीं आप ने देखा है?" इस पर रामू ने कहा कि लगता है कि मेरे घर के पीछे है। वह धोबी आव देखा न ताव और चुपके से जाकर बाघ का कान पकड़कर उसकी पीठ पर बैठ गया और लगा मुअड़ी से मारने। बाघ की अक्ल घास चरने चली गई और उसने सोचा कि कहीं एही तो टिपटिपवा नहीं। अब बाघ क्या किया कि अपनी जान लेकर जंगल की ओर भागा। अभी वह जंगल में पहुँचने ही वाला था तभी बिजली चमकी। बिजली के चमकते ही प्रकाश हो गया और उस प्रकाश में धोबी ने देख लिया कि यह गदहा नहीं बाघ है। अब धोबीराम की सीट्टी-पिट्टी गुम। वह जल्दी से बाघ की पीठ पर से कूदकर वहीं एक पीपल की धोंधर में छिप गया। यह सब खेल एक लोमड़ी देख रही थी। उसने भागते हुए बाघ को रोका और पूछा, "मामा, मामा! क्यों भाग रहो हो?" बाघ बोला, "तुम भी भागो। पीछे टिपटिपवा पड़ गया है।" इसपर लोमड़ी ने कहा कि वह कोई टिपटिपवा-उपटिपवा नहीं है। चलिए मैं आपको दिखाती हूँ।
जब लोमड़ी बाघ के साथ पीपल के पास पहुँची तो जिस धोंधर में धोबी छिपा हुआ था उसी में अपनी पूँछ डालकर लगी हिलाने। वह सोच रही थी कि छिपे हुए आदमी का दम घुटने लगेगा और वह बाहर आ जाएगा। पर हुआ ठीक इसके उलटा। धोबी ने अपने दाँतों से कच से लोमड़ी की पूँछ काट ली। लोमड़ी चिल्लाई, "भागिए मामा, भागिए। यह टिपटिपवा नहीं पूँछकटवा है (भागs मामा, भागs, इ टिपटिपवा नाहीं पोंछिकटवा हs)।"इसके बाद लोमड़ी और बाघ जंगल में भाग गए और धोबी अपने घर चला आया।

इसके बाद फिर-फिर बाघ कभी गाँव की ओर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
कथा गया वन में, सोचिए अपने मन में।

-प्रभाकर पाण्डेय

2 टिप्पणी:

Gyandutt Pandey ने कहा…

मेरी पत्नी उवाच: "अरे ई किहनी त हमार नानी सुनाय रहीं बार-बार!"

राज भाटिय़ा ने कहा…

बचपन का टिपटिपवा याद दिला दिया, धन्यवाद

 
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