कुछ दिन पहले की बात है। एक दिन शाम के समय मैं विले- पार्ले जाने के लिए 422 नंबर का बस पकड़ा। मेरे साथ मेरे एक परिचित भी थे। बस में हम दोनों लोगों को बैठने के लिए सीट मिल गई। जब बस दो-तीन स्टाप आगे गई तो बहुत सारे लोग चढ़ गए और बस ठसाठस भर गई। मैं जिस सीट पर बैठा था वहीं एक औरत आकर खड़ी हो गई। वह बुरका पहने हुए थी।
अपना बैठना और एक महिला का खड़ा रहना मुझे अच्छा नहीं लगा और उस महिला को सीट देने के लिए मैं उठना चाहा। हमारे परिचित ने मुझे खींचकर बैठाते हुए कहा, ”खड़ा क्यों हो रहे हैं? अपना स्टाप तो अभी बहुत आगे है।” मैंने कहा, “आप देख नहीं रहे हैं, पास में एक महिला खड़ी है। उसको बैठने के लिए अपनी सीट खाली कर रहा हूँ।” इसके बाद हमारे परिचित ने मेरे कान मे कहा, “देख नहीं रहे हैं, बुरका पहनी है।” उनकी यह बात सुनते ही मेरे शरीर में आग लग गई। मैंने कहा, “बुरका पहनने से क्या हुआ? वह हिंदू हो या मुसलमान उससे क्या? बस मैं यही जानता हूँ कि वह औरत है और उम्र में मुझसे बड़ी भी। अस्तु मानवता कहिए या संस्कार, मुझे उसे सीट देनी ही है और हिंदू धर्म में कहाँ कहा गया है कि अन्य धर्मवाले इंसान नहीं। अपने नहीं।”
हमलोगों की बात-चीत अभी चल ही रही थी तबतक वह महिला आगे बढ़ चुकी थी और एक धोती-कुरताधारी पुरुष ने जो चंदनधारी भी था अपनी सीट उस महिला को दे चुका था।
मेरी आँखे अश्रुपूरित हो गई थीं और मैं एकबार अपने परिचित को देख रहा था और एकबार उस धोती-कुरताधारी पंडित की ओर, जिसके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान, संतुष्टि और सौम्यता तैर रही थी।
हमारे हृदय से आवाज आई, "न मानवता मरी है न कभी मरेगी पर हाँ कुछ संकीर्ण मानसिकतावालों ने अपनी मानवता को मार दिया है।" पहले मानवतावाद फिर कोई वाद।
अपना बैठना और एक महिला का खड़ा रहना मुझे अच्छा नहीं लगा और उस महिला को सीट देने के लिए मैं उठना चाहा। हमारे परिचित ने मुझे खींचकर बैठाते हुए कहा, ”खड़ा क्यों हो रहे हैं? अपना स्टाप तो अभी बहुत आगे है।” मैंने कहा, “आप देख नहीं रहे हैं, पास में एक महिला खड़ी है। उसको बैठने के लिए अपनी सीट खाली कर रहा हूँ।” इसके बाद हमारे परिचित ने मेरे कान मे कहा, “देख नहीं रहे हैं, बुरका पहनी है।” उनकी यह बात सुनते ही मेरे शरीर में आग लग गई। मैंने कहा, “बुरका पहनने से क्या हुआ? वह हिंदू हो या मुसलमान उससे क्या? बस मैं यही जानता हूँ कि वह औरत है और उम्र में मुझसे बड़ी भी। अस्तु मानवता कहिए या संस्कार, मुझे उसे सीट देनी ही है और हिंदू धर्म में कहाँ कहा गया है कि अन्य धर्मवाले इंसान नहीं। अपने नहीं।”
हमलोगों की बात-चीत अभी चल ही रही थी तबतक वह महिला आगे बढ़ चुकी थी और एक धोती-कुरताधारी पुरुष ने जो चंदनधारी भी था अपनी सीट उस महिला को दे चुका था।
मेरी आँखे अश्रुपूरित हो गई थीं और मैं एकबार अपने परिचित को देख रहा था और एकबार उस धोती-कुरताधारी पंडित की ओर, जिसके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान, संतुष्टि और सौम्यता तैर रही थी।
हमारे हृदय से आवाज आई, "न मानवता मरी है न कभी मरेगी पर हाँ कुछ संकीर्ण मानसिकतावालों ने अपनी मानवता को मार दिया है।" पहले मानवतावाद फिर कोई वाद।
आज भी मेरी नजरों में वह धोती-कुर्ताधारी पक्का मानवतावादी, हिंदूवादी है जबकि मेरे उस परिचित की नजरों में वह ब्राह्मण के नाम पर कलंक।
मदर टेरेसा की इस उक्ति (मेरे लिए सूक्ति) “जब हम उस मनुष्य से, जीव से प्रेम नहीं कर सकते जो हमारी आँखों को दिखता है तो हम उस ईश्वर से कैसे प्रेम कर सकते हैं जो हमें दिखता ही नहीं।” के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ।



14 टिप्पणी:
“जब हम उस मनुष्य से, जीव से प्रेम नहीं कर सकते जो हमारी आँखों को दिखता है तो हम उस ईश्वर से कैसे प्रेम कर सकते हैं जो हमें दिखता ही नहीं।
बहुत अर्थ पूर्ण रचना...जिस दिन हम इस बात को मन से मान लेंगे उस दिन से दुनिया में अमन-ओ शान्ति का राज होगा...इंसान को इंसान समझिये बस मजहब से अलग...फ़िर देखिये ये दुनिया कितनी रंगीन हो जाती है.
नीरज
बहुत ही वितारपूर्ण बात प्रभाकर भाई।
बहुत ही प्रेरक बात बताई आपने.
आज के समय में सचमुच पालन करने योग्य वृतांत.
आपने बहुत अच्छा और सच्चा लिखा.
बधाई.
यही वो बाते हे जिस से पता चलता हे कि अभी भी मानवता जिन्दा हे, धन्यवाद.
प्रभाकर भाई, बहुत प्रेरक प्रसंग। दोष विभादनकारी राजनीति का है, जिसने हमारे मानस को इतना संकीर्ण बना दिया है।
हां, एक बात और पता चली कि आप मुंबई में हैं। अफसोस की बात है कि इतनी ब्लॉगर बैठकों के बाद भी आपसे मिलना नहीं हो पाया है।
"न मानवता मरी है न कभी मरेगी पर हाँ कुछ संकीर्ण मानसिकतावालों ने अपनी मानवता को मार दिया है। --बिल्कुल सही!
बहुत ही प्रेरणास्पद। सुंदर।
मानवता इतनी जल्दी मरने वाली नही, इस बार तो आप रह गये लेकिन अगली बार जाहिर है अपने परिचित की बात नही सुनेंगे। प्रेरणा दायक था ये प्रसंग।
sahi kaha aapne.manwta puri tarah mari nahi.sundar lekh.
manawtaa na mari hai aur naa maregi.use zindaa rakhna aapka aur humara farz hai
सही कहा आपने, संकीर्णता ही जड़ है जो हमारी-आपकी, सब की मानसिकता पर भारी पड़ जाती है। अच्छी पोस्ट।
मानव का यही आशावाद मानवता को मरने नहीं देगा... ऐसे ही प्रेरणादायक प्रसंग मरती मानवता में प्राण फूँकते हैं.
मानवता या तो भाप बन जाती है या फ़िर जम जाती है, किसी किसी के लिए
कुछ संकीर्ण मानसिकतावालों ने अपनी मानवता को मार दिया है....प्रेरणादायक प्रसंग.धन्यवाद.
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