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15-06-2010

वाह..भाई...वाह...समझ समझ के समझ को समझो......

यहाँ कुछ रचनाएँ प्रस्तुत हैं...ये रचनाएँ मेरी नहीं है कहीं से सुनी गई हैं। रचनाकारों का नाम मुझे याद नहीं पर पठन योग्य हैं।। सादर।।


1. समझ समझ के समझ को समझो,
समझ समझना भी एक समझ है।
समझ समझ के जो न समझे,
मेरे समझ में वो ना समझ है।


2. हरि को खोजन हरि गए, हरि गए हरि के पास,
जब हरि हरि में मिले तो हरि हुए उदास।


3. जो पहुँची तूने भेजी है, वह पहुँची अब पहुँची है,
लेकिन फिर भी क्या पहुँची है, पहुँची तक न पहुँची है।


और अंत में सूरदास की यह रचना......


कहत कत परदेसी की बात,
मंदिर अरध अवधि बदि हमसों,
हरि अहार चलि जात।
सुर रिपु बरस,चंद्र रिपु युगवर,
हरि रिपु कीन्हों घात।
मघ पंचक ले गयो साँवरो,
ताते जी अकुलात,
नछत-बेद-ग्रह जोड़ि अर्ध करि,
सोई बनत अब खात।


हरि आहार का मतलब शेर का आहार यानि मांस तो यहाँ मांस से नहीं मास से मतलब है। कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण हम गोपियों से मंदिर अरध (मंदिर का मतलब घर और उसका अरध मतलब पाख या पक्ष यानि 15 दिन) का समय लेकर गए पर महीना बीत रहा है। सुर रिपु मतलब रात और चंद्र रिपु मतलब दिन और हरिरिपु मतलब कामदेव।
और हाँ मघ पंचक ले गयो साँवरो मतलब मघा नक्षत्र से पाँचवा नक्षत्र यानि चित्रा तो यहाँ चित्रा का मतलब चित्त से है यानि हमलोगों का चित्त लेकर चले गए हैं। नछत-बेद-ग्रह जोड़ि अर्ध करि (नक्षत्र 27, बेद 4, ग्रह 9, जोड़ने पर 40 और उसका आधा बीस यानी विष खाने की इच्छा हो रही है।)


ऊपर वाली रचनाओं का अर्थ आप बताएँ नहीं तो कुछ समय का इंतजार करें फिर मैं बताऊँगा।


सादर।।

5 टिप्पणी:

दिवाकर मणि ने कहा…

बहुत सुंदर संकलन है....ये पंक्तियां केवल पठन योग्य ही नहीं अपितु गुनने योग्य भी हैं....इन पंक्तियों को यहां प्रस्तुत करने हेतु आपका साधुवाद....

बेनामी ने कहा…

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ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

इस समझ को हम अच्छे से समझे।
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भविष्य बताने वाली घोड़ी।
खेतों में लहराएँगी ब्लॉग की फसलें।

सर्प संसार ने कहा…

बहुत सुंदर कलेक्शन।
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क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

Maria Mcclain ने कहा…

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